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जिंदगी यूँ चली, होके खुद से खफ़ा |
पाके भी खो दिया, हमने सब हर दफ़ा ||
कोई साथी नहीं, कोई संग ना चला |
दर्द की रह में, हँसी हुई बेवफा ||

– गौरव संगतानी

कैसे कह दूं कि तेरी याद नही आती है,

मेरी हर सांस मे बस तू ही महकाती है.

आज भी रातों को जब चौंक के उठता हूँ,

बस तू ही नही, हर शह तो नज़र आती है..!

– गौरव संगतानी 

कितनी दफा हम पूछते हैं न….. आख़िर क्यूँ..???

 

कुछ बातों का कोई कारण नही होता

कोई अर्थ नहीं होता

कोई तर्क नहीं होता

आप स्वीकारें न स्वीकारें….

कोई फर्क नही होता….!!!

 

कुछ सवालों का कोई जवाब नही होता

कोई शुरुआत नही होती

कोई अंत नहीं होता

आप कितना ही पूछें…

कोई हल नहीं होता….!!!

 

कुछ रास्तों की कोई मंजिल नहीं होती

कोई आसरा नही होता

कोई ठिकाना नहीं होता

आप कितना ही चलतें रहें….

कोई साथी कोई सहारा नहीं होता…..!!!

 

और कुछ ज़ज्बातों के लिए लफ्ज़ नहीं होते….. बस कुछ नहीं होता…!!!

 

– गौरव संगतानी

दिल्ली धमाको क़ी खबर देखी तो कुछ सवाल से फिर से घूमने लगे जहन में…. 
सोचा कुछ लिखू…. पर याद आया कि कल ही एक फिल्म देखी थी  वेडनेसडे….. 
उसमे नसारूद्दीन शाह के संवादकाफ़ी हद तक बहुत कुछ बयान करते है…. 
उसी के अंश दे रहा हूँ…. कुछ भाग काट दिया है ताकि आपका फिल्म देखने का मज़ा खराब ना हो

बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं….. क्या कहते हैं आप….?

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” आपके घर मे कोकरोच आता है तो आप क्या करते हैं साहब…. उसे पालते नही मारते हैं….. “

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“तुम हो कौन..?”


“मैं वो हूँ आज बस और ट्रेन मे चड़ने से डरता है…..
मैं वो हूँ जो काम पे जाता है तो उसकी बीबी को लगता है कि जंग पे जा रहा है……

पता नही लौटेगा कि नही….

हर दो घंटे बाद फोन करती है…. चाइ पी कि नही.. खाना खाया कि नही

दरअसल वो ये जानना चाहती है कि मैं ज़िंदा हूँ कि नहीं….
मैं वो हूँ जो कभी बरसात मे फस्ता है कभी ब्लास्ट में
मैं वो हूँ जो किसी के हाथ मे तस्वीर देख के शक करता है

और मैं वो भी हूँ जो आजकल दाडी  बड़ाने और टोपी पहनने से डरता है…..
बिज़्नेस के लिए दुकान खरीदता है तो सोचता है दुकान का नाम क्या रखूं

कहीं दंगे मे नाम देख के मेरी दुकान ना जला दें……
झगड़ा किसी का भी हो…. बेवजह मरता मैं ही हूँ….

भीड़ तो देखी होगी ना अपनेभीड़ मे से कोई एक शकल चुन लीजिए….. मैं वो हूँ… “
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“पिछली बार ट्रेन मे मारा था, इस बार कही और मारेंगे..और तब तक मारते रहेंगे जब तक हम इन्हे जवाब देना नही सीखेंगे….

……. मैं साबित कुछ नही करना चाहतामैं सिर्फ़ आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि लोगों मे गुस्सा बहुत हैउन्हे आजमाना बंद कीजिए..
वी अरे रेबेलियन बाइ फोर्स नोट बाइ चाय्स…”

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” ग़लती हमारी हैहम लोग बहुत जल्दी यूज़्ड टू हो जाते हैं
एक ऐसा हादसा होता है तो चैनल बदल बदल के सारा माजरा देख लिया….

एस एमेस कर दिया फोन कियाशुकर मनाया कि हम लोग बच गये
फिर हम उस सिचुयेशन से लड़ने के बजये उसके साथ अड्जस्ट करना शुरू कर देते हैं..

पर हमारी भी मजबूरी है ना… हमे घर चलन होता है साहबइसीलिए हम सरकार चुनते हैं….कि वो मुल्क चलाए
………एक आदमी गुनहगार है कि नही इसको साबित करने के लिए आपको दस साल लग जाते हैं… 

आपको नही लगता कि ये आपकी काबिलियत पे सवाल है..?

आप जैसे लोग इन किडो का सफ़ाया नही करेंगे तो हमे झाड़ू उठानी होगी
लेकिन क्या है कि उस से हमारी इस सिविलाइज़्ड सोसाइटी का बॅलेन्स बीगाड़ जाएगा.. लेकिन क्या करें…”

 

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“मुझे यकीन है कि जो ब्लास्ट हुए वो एक टेररिस्ट आक्टिविटी नही थी… वो एक बहुत बड़ा सवाल था
और वो सवाल ये था कि.. हम तो तुम्हे इसी तरह मारेंगे… तुम क्या कर लोगे… येस थे आस्क्ड अज़ दिस क्वेस्चन…..”

 

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“तुम्हारा कोई जान पहचान वाला मारा था इस ब्लास्ट मे….?”

“क्योंमुझे उस दिन का इंतेजर करना चाहिए… जब मेरा कोई अपना बेवजह इस तरह कि जॅलील मौत मारे….

….. ये आक्सेप्टबल नही है…..”

 

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“कोई @#$%@#% बटन दबा के मेरे लिए ये फ़ैसला नही करेगा कि मुझे कब मरना है

मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा बच्चा घर से बाहर निकले तो बेखौफ़ घूमे कहीं भी कभी भी ट्रेन मे बस मे…. कही भी…..”

 

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“आम आदमी से यही उम्मीद क़ी जाती है… 

आम आदमी कि तरह जियो…. 

आम आदमी कि तरह बर्दाश्त करो… 

और आम आदमी कि तरह मरो….”

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कहता तो बहुत कुछ है…. पर क्या हम सुन पाए……?????

 

शेर

जाने किसके के शेर है….. पर अच्छे लगे सो बाँट रहा हूँ…….

कितना खुश्फहम कोई इंसान हो सकता है
कभी तन्हाई में, आईना उठा के देखो…..

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दबा के कब्र मे, सब चल दिए ! दुआना सलाम !
ज़रा सी देर मे, क्या हो गया जमाने को !

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दिल कि रग रग निचोड़ लेता है
इश्क़ मैं ये बड़ी मुसीबत है…..

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इक तुम्हारे रूठ जाने से
किसी को कुछ नहीं होता
फूल भी महकते हैं
रंग भी दमकते हैं
सूरज भी निकलता है 
तारे भी चमकते हैं
लेकिन इतना ज़रूर होता है
इक तुम्हारे रूठ जाने से
कोई हँसना भूल जाता है …!!

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हम नींद के शोक़ीन ज़्यादा नही लेकिन,
कुछ खवाब ना देखें तो गुज़ारा नही होता…….

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यूँ तो पत्थर क़ी भी तक़दीर बदल सकती है
शर्त यह है क़ी उसे दिल से तराशा जाए

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शेष फिर कभी…..

सुनना चाहें यदि तो…. क्लिक करें:

http://gauravsangtani.podomatic.com/enclosure/2008-08-20T11_53_00-07_00.mp3

http://gauravsangtani.podomatic.com/

आइए सुने एक नज़्म जो ना जाने किसने लिखी है… पर बहुत कुछ कहती है..

 

http://gauravsangtani.podomatic.com/enclosure/2008-08-17T12_38_15-07_00.mp3

राह आसान हो गई होगी 
जान पहचान हो गई होगी 

फिर पलट कर निगाह नहीं  
तुझ पे क़ुरबाँ हो गई होगी 

तेरी ज़ुल्फो को छेडती थी सबा 
खुद परेशाँ हो गई होगी 

उन से भी छीन लोगे याद अपनी 
जिन का ईमान हो गई होगी 

मरने वालो पे ‘सैफ‘ हैरत क्यों 
मौत आसान हो गई होगी 

– सैफुद्दीन सैफ