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Archive for June, 2008

आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़ी सब दौलत और शौहरत,
मुझे बेनामी का सुकून लौटा दो….
अक्सर तुम्हे देखा है नुक्कड़ पे बच्चो के साथ फुटबाल खेलते,
मैं भी सनडे को साहब के साथ गोल्फ खेलने जाता हूँ…..

बोलो तो खेल बदल लें
आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़े सब ओहदे और तोहफे,
मुझे बेनामी का प्यार लौटा दो….
कल तुम्हे देखा था दीनू के घर का छप्पड़ डालते,
मैं भी कंप्यूटर पे इमारतों के ख़ाके खींचा करता हूँ….

बोलो तो ये काम बदल लें….
आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़े सब शिकवे और शिकायतें,
मुझे बेनामी का भोलापन लौटा दो…..
रोज शाम तुम्हे देखता हूँ मॅरी के साथ मरीन ड्राइव पे,
मैं भी रीना, टीना, गीता, रानी और आरती के साथ फ्राइडे नाइट पब मे जाता हूँ….

बोलो तो ये प्यार बदल लें….
आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़े सब कसमे और वादे,
मुझे बेनामी का सीधापन लौटा दो…..
अक्सर तुम्हे पाता हूँ पान वाले, नन्हे नंदू और गंगा काकी से बतियाते,
मैं भी घंटो कान्फरेन्स कॉल पे बातें करता हूँ….

बोलो तो ये पहचान बदल लें
आओ आज नाम बदल लें…!

गौरव संगतानी

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क्या लिखूं….

पैगाम लिखूं
तुझे जज़्बात लिखूं
या अपने ये हालात लिखूं….

क्या लिखूं….

रातें लिखूं
वो बातें लिखूं
या ठहरी हुई मुलाक़ातें लिखूं

क्या लिखूं….

जीत लिखूं
इसे हार लिखूं….
या प्यार का व्यापार लिखूं…..

क्या लिखूं….

तुझपे लिखूं
खुद को लिखूं….
या बेहतर है कुछ ना लिखूं…..

क्या लिखूं….

– गौरव संगतानी

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गीले काग़ज़ क़ी तरह है ज़िंदगी अपनी,
कोई जलाता भी नहीं और कोई बुझाता भी नहीं |
इस कदर अकेले हो गये हैं आज कल,
कोई सताता भी नहीं और कोई मनाता भी नहीं ||
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आँखो मे महफूज़ रखना सितारों को,
राह मे कहीं ना कहीं रात होगी |
मुसाफिर तुम भी हो, मुसाफिर हम ही हैं,
किसी ना किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी ||
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पलकों के किनारे भिगोए ही नहीं,
वो सोचते हैं कि हम रोए ही नहीं |
वो पूछते हैं ख्वाबों मे किसे देखते हो,
और एक हम हैं कि एक उम्र से सोए ही नहीं ||
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दिल जीत ले वो जिगर हम भी रखते हैं,
कत्ल कर दे वो नज़र हम भी रखते हैं |
वादा किया है किसी को मुस्कराने का,
वरना आँखों मे समंदर हम भी रहते हैं ||
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परिंदों को मिलेंगी मंज़िलें,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं |
वही लोग रहते हैं खामोश अक्सर,
ज़माने मे जिनके हुनर बोलते हैं ||

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दुआ

मैने खुदा से दुआ माँगी
 खुदा कोई तो ऐसा दे.. 
जो अंधेरो को उजालों मे बदल दे
जो उदास चेहरे पे मुस्कान ला दे
कोई तो ऐसा हो जो उम्मीद क़ी किरण जगाए
कोई जो फिर से हसीं लौटाए
इक शक्स ऐसा जो मझधार मे साथ ना छोड़े
इक साथी ऐसा जो अपने वादे ना तोड़े…..

मैने मुड़के देखा तो तुम खड़े थे

मुझे लगा मुझसे भूल हो गयी है…..
मेरी दुआ तो कब से कबूल हो गयी है…!

– गौरव संगतानी

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कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नही…….

 

एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूठ है आधा सच्चा सा…..
जज़्बाद को ढकके एक परदा बस,
एक बहाना अच्छा सा…..
जीवन का ऐसा साथी है,
जो दूर ना होके पास नही…….

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं, 
तुम कह देना कोई खास नही…….

– अज्ञात  

 

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    कुछ शेर धुंधले से…. कहीं सुने थे कभी…. जिन्होने भी लिखे हैं उन्हे सलाम

    . तेरी याद मे जल रहा हूँ मैं,
    जहाँ तक रोशनी हो… चले आओ.. चले आओ…..!

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    . किस ज़ुबान से करें शिकवा हम उनके ना आने का,
    ये एहसान क्या कम है कि हमारे दिल मे रहते हैं…!

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    . उनकी मसरूफ़ियत ने बाँधे रखा होगा उन्हे,
    वरना क्या मज़ालवो हमे याद ना करें…!

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    . एक ज़रा सी बात पे बरसों के याराने गये
    हाँ मगर अच्छा हुआ कुछ लोग पहचाने गये…!

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    . तेरी बेवफ़ाई का शिकवा नही मुझे
    गिला तो तब हो जब तूने किसी से भी निभाई हो…!

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    .  खुदा अगर ये सच है 
    कि दिलों क़ी मोहब्बतो मे तू नज़र आता है…..
    तो क्यों टूटते हैं दिल….
    और खुद तेरा ही वज़ूद बिखर जाता है…..!

    …. शेष फिर कभी…..

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हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया

कैसे मर-मर के गुज़ारी है तुम्हें क्या मालूम
रात भर तारों भरी रात पे रोना आया

कितने बेताब थे रिम झिम में पिएँगे लेकिन
आई बरसात तो बरसात पे रोना आया

कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

‘सैफ’ ये दिन तो क़यामत कि तरह गुज़रा है
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया

– सैफुद्दीन सैफ

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