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Archive for April, 2008

हो गयी है शाम, तेरी याद  रही है |
हर तरफ है धुन्ध, हर आस जा रही है ||
खो गया है अब तो मेरा खुद का वजूद भी,
ना जाने किस लिहाज़ से ये सांस  रही है||

तेरे दिए गम के साथ ही जिए जा रहा हूँ,
कैसे कर लूँ यकीन तेरी तरह छोड़ के ना जाएगा ये|
किसी और से ना उम्मीद ना गिला है कोई अब,
तेरे गम के दायरे मे ही ये उम्र जा रही है ||

गौरव संगतानी

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रातों को चुपके से कोई साया आता है,
हवा का हर झोंका तेरी याद लाता है |
कब तक यूँ ही तपड़ता रहूँगा मैं,
क्यों हर बार मेरा मुक़द्दर मेरे दर से लौट जाता है ||

 गौरव संगतानी

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जितना चाहा है तुम्हे…. वो चाहत कहाँ से लाओगे…!
चाहत मिल भी गयी तो ये दिल कहाँ से लाओगे..!
दिल ढूँढ भी लिया तुमने तो वो इतना जल नही पाएगा,
मैं फिर कहता हूँ….. जितना चाहा है तुम्हे कोई चाह नही पाएगा…!

गौरव संगतानी

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