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Archive for November, 2007

मंजिलें भी उसकी थी, रास्ता भी उसका था |
एक मैं अकेला था, काफिला भी उसका था |
साथ साथ चलने की सोच भी उसकी थी, फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था |
आज क्यों अकेला हूँ, दिल सवाल करता है |
लोग तो उसके थे, क्या खुदा भी उसका था…..!

– अग्यात

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शाम

शाम होते ही चरागों को बुझा देता हूँ मैं,
इक दिल ही काफी है तेरी याद में जल जाने के लिए |

-अग्यात

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बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||

वो तेरा नजरे मिलाना और पलकें झुकाना याद है मुझे |
वो तेरा सब कुछ समझना और बच के निकलना याद है मुझे ||
मेरा आङों से तकना और तेरी नजरों का मुझको पकङना,
वो भरी दुपहरी छतों पे फिरना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

वो तेरी गलियों में मेरा भटकना याद है मुझे |
वो उन्हीं राहों से फिर फिर गुजरना याद है मुझे |
तेरी एक झलक को वो घन्टों नुक्कङ पे ठहरना,
फिर सब से बच बच के तुझको तकना याद है मुझे |

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

मेरे कहने से पहले तेरा सब कुछ समझना याद है मुझे |
मेरे इजहार-ए-मोहब्बत से तेरा हर पल डरना याद है मुझे |
तेरे खतों का वो लम्बा इंतजार,
और चन्द अलफ़ाज़ों में तेरा बहुत कुछ लिखना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

मेरी हर बात पे तेरा खिलखिला के हसना याद है मुझे |
इजहार करके तेरा खुद से ही बचना याद है मुझे |
अपनी तारीफ सुनकर तेरा वो शरमाना,
मेरे हर सवाल पे वो तेरा बाते बदलना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||

– गौरव संगतानी

(अभी और बहुत कुछ याद है मुझे…)

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समझे नहीं जो खामोशी मेरी,
मेरे लब्जों को क्या समझेंगे |

बचते रहे उम्र भर साये से मेरे,
मेरे जख्मों को क्या समझेंगे |

भूल जाना यूँ तो नहीं है, रवायत मोहब्बत की |

समझे नहीं जो हालात मेरे,
इन रस्मों को क्या समझेंगे |

– गौरव संगतानी

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