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Archive for September, 2007


काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
चाहत ये ना थी सब कुछ मिलेपर कभी कुछ तो मिला होता….

हर क़दम पे तेरे साथ चले थे हम,
किसी क़दम पे हमें भी इसका सिला मिला होता….

काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.

अब हम थक गये हैं इस चाहत से, इस जीने से.
मर जाते अगर कफ़न में तेरा आँचल मिला होता….

काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
चाहत ये ना थी सब कुछ मिलेपर कभी कुछ तो मिला होता….

गौरव संगतानी

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सदियां….

जिसकी आँखों में टी थी सदियां
उसने सदियों की जुदाई दी है…..
 

तेरी आवाज़ सुनाई दी है..

गुलज़ार 

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बहुत पहले लिखा था ये शेर, आज फिर याद  रहा है…..

आग बुझ गयीपर धुआँ अभी बाक़ी है.
हम कहते हैं इश्क़ नहींपर नशा अभी बाक़ी है.
नशे का क्या हैये तो उम्र भर रहेगा.
शुक्र है खुदा का, जान अभी बाक़ी है.

गौरव संगतानी

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मोहब्बत पलकों पे कितने हसीं ख्वाब सजाती है..
फूलों से महकते ख्वाब..
सितारों से जगमगाते ख्वाब..
शबनम से बरसते ख्वाब..

फिर कभी यूँ भी होता है
की पलकों की डालियों से ख्वाबों के सारे परिंदे उड़ जाते हैं
और आँखें हैरान सी रह जाती हैं.

– जावेद अख़्तर

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सुना है वक़्त के पंख हुआ करते हैं….
कुछ लम्हों में हमने इसे ठहरे हुए देखा है.
किसी की ज़ुल्फ़ो में अटके हुए देखा है
झील सी आँखों में भटकते हुए देखा है…..

बहुत तेज़ी से निकल गया जब भी रोकना चाहा इसको,
सारी यादें साथ ले गया समेटना चाहा जिनको.
पर वो कुछ लम्हें आज भी वहीं ठहरें हैं,
आधी रातों को हमने इन्हे महकते हुए देखा है……

सुना है वक़्त के पंख हुआ करते हैं….
कुछ लम्हों में हमने इसे ठहरे हुए देखा है.
किसी की ज़ुल्फ़ो में अटके हुए देखा है
झील सी आँखों में भटकते हुए देखा है…..

वो फसाना झूठ नहीं हो सकता जो ख़ुद तूने कहा था,
वो सब ख्वाब नहीं हो सकता जो देखा इन आँखों नें..
तेरी वफ़ा कैसे सवाल करूँ मैं,
पर बदलते वक़्त के साथ तुझे मैने बदलते हुए देखा है…

सुना है वक़्त के पंख हुआ करते हैं….
कुछ लम्हों में हमने इसे ठहरे हुए देखा है.
किसी की ज़ुल्फ़ो में अटके हुए देखा है
झील सी आँखों में भटकते हुए देखा है…..

– गौरव संगतानी

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