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Gaurav Sangtani – कुछ ख्वाब बिखरे से….

Hammer StrokeIn a hope that this will work like stroke of a hammer….

A tea with me Let’s share something over morning tea…

एक प्याला चाय कुछ बातें सुबह की चाय के साथ…..

Words are not here Some english poetry……

Ganges cry of a dying river…...

XBRL Indiabe ready its coming to India….

iTaxationIts all about taxation………

Mumbai 26/11 Stories behind those 3 days….

जितना जाना जिंदगी को,

बस इतना ही जाना है जाना……

कुछ भी नहीं है जानने को,

बस वो पाया जिसने जो माना….

सारे पोथे, सारी बातें,

मन को बहलाने का खेला….

जिसका मन बहले है जिस से,

वो समझे उसने वो जाना……

बातों से ही तो बनी है दुनिया,

बातें तेरी मेरी और सबकी…….

बातों की मोहब्बत, झगडे बातों के,

सच में तो सबको है जाना…..

मानो तो जादू का पिटारा,

या मानो जंगल वीरान……

जिसने जो माना वो दुनिया उसकी,

सच तो फिर भी कोई न जाना…..

– गौरव संगतानी

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Jitna jana jindagi ko,

Bas itna hi jana hai jana….

Kuch bhi nahi hai janane ko,

bas wo paya jisne jo mana…..

Saare pothe, saari baate,

Man to behlane ka khela….

Jiska man behle hai jis se,

Wo samjhe usne wo jana….

Baato se hi to bani hai duniya,

Baate teri, meri aur sabki….

Baato ki mohabbat, jhagde baato ke,

Sach me to sabko hai jaana…..

Maano to jaadu ka pitara,

Ya maano jangal viraan…..

Jisne jo mana wo duniya uski,

sach to fir bhi koi na jaana…..

– Gaurav Sangtani

क्यूँ मसरूफ रहें हर वक्त, चंद लम्हें फुर्सत के भी बिताएं जाएँ |
क्यूँ हर रिश्ते का नाम हो, एक मोहब्बत बेनाम भी निभाई जाये ||
तेरा नाम न आ जाये जुबान पे, ये कहानी दिल में ही छुपाई जाये |
खुली आँखों से देखें हैं ख्वाब तेरे, एक रात जग के भी बितायी जाये ||

– गौरव संगतानी

सोचा नहीं कभी हमने,
क्यूँ दिल तुमबिन परेशां है |
क्यूँ सांसे उखड़ी उखड़ी हैं,
आँखें क्यूँ हैरान हैं ||

सोचा नहीं कभी हमने,
क्या रिश्ता ये अनजाना सा |
क्या डोर बांधें है हमको,
क्यूँ लगता सब अफसाना सा ||

सोचा नहीं कभी हमने,
क्या होगा जब तुम जाओगे |
खुद को ही खो देंगे हम,
तेरी यादों में ही खोएंगे ||

– गौरव संगतानी

हत्थां दा लिख्या लक्ख मिटाए कोई,
हत्थां ते लिख्या नहीं मिटदा…..
लक्ख करें जतन तू जट्टा,
किस्मत दा लिख्या नहीं मुकदा….

लोकी पराये हो गए,
ते हुए अपने बेगाने…
किस्मत दा ए रोला सारा,
ऎंवे कोई नहीं बदलदा….
हत्थां ते लिख्या नहीं मिटदा…..
किस्मत दा लिख्या नहीं मुकदा….

– गौरव संगतानी

खुद में उलझ के रह गयी, ये जिंदगी की दास्ताँ..
कोई ओर नहीं कोई छोर नहीं, न संग कोई कारवां….

– गौरव संगतानी

आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं

ज़ख़्म दिखते नहीं अभी लेकिन
ठंडे होगे तो दर्द निकलेगा
तैश उतरेगा वक्त का जब भी
चेहरा अंदर से ज़र्द निकलेगा

आज बिछड़े हैं…

कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं

आज बिछड़े हैं ..

कल जो आयेगा, जाने क्या होगा
बीत जाये जो कल नहीं आते
वक्त की शाख तोड़ने वालों
टूटी शाखों पे फल नहीं आते

आज बिछड़े हैं ..

कच्ची मिट्टी है, दिल भी इंसा भी
देखने ही में सख्त लगता है
आंसू पोंछे तो आंसुओं के निशां
खुश्क़ होने मे वक़्त लगता है

आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं

– गुलज़ार

भीनी भीनी सी खुशबु तेरी,
महका महका सा एहसास है… |
एक अरसा हुआ तुझको देखे हुए…
पर तू हर लम्हा मेरे पास है…. ||

– गौरव संगतानी

जिंदगी यूँ चली, होके खुद से खफ़ा |
पाके भी खो दिया, हमने सब हर दफ़ा ||
कोई साथी नहीं, कोई संग ना चला |
दर्द की रह में, हँसी हुई बेवफा ||

– गौरव संगतानी

कैसे कह दूं कि तेरी याद नही आती है,

मेरी हर सांस मे बस तू ही महकाती है.

आज भी रातों को जब चौंक के उठता हूँ,

बस तू ही नही, हर शह तो नज़र आती है..!

– गौरव संगतानी 

कितनी दफा हम पूछते हैं न….. आख़िर क्यूँ..???

 

कुछ बातों का कोई कारण नही होता

कोई अर्थ नहीं होता

कोई तर्क नहीं होता

आप स्वीकारें न स्वीकारें….

कोई फर्क नही होता….!!!

 

कुछ सवालों का कोई जवाब नही होता

कोई शुरुआत नही होती

कोई अंत नहीं होता

आप कितना ही पूछें…

कोई हल नहीं होता….!!!

 

कुछ रास्तों की कोई मंजिल नहीं होती

कोई आसरा नही होता

कोई ठिकाना नहीं होता

आप कितना ही चलतें रहें….

कोई साथी कोई सहारा नहीं होता…..!!!

 

और कुछ ज़ज्बातों के लिए लफ्ज़ नहीं होते….. बस कुछ नहीं होता…!!!

 

– गौरव संगतानी

दिल्ली धमाको क़ी खबर देखी तो कुछ सवाल से फिर से घूमने लगे जहन में…. 
सोचा कुछ लिखू…. पर याद आया कि कल ही एक फिल्म देखी थी  वेडनेसडे….. 
उसमे नसारूद्दीन शाह के संवादकाफ़ी हद तक बहुत कुछ बयान करते है…. 
उसी के अंश दे रहा हूँ…. कुछ भाग काट दिया है ताकि आपका फिल्म देखने का मज़ा खराब ना हो

बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं….. क्या कहते हैं आप….?

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” आपके घर मे कोकरोच आता है तो आप क्या करते हैं साहब…. उसे पालते नही मारते हैं….. “

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“तुम हो कौन..?”


“मैं वो हूँ आज बस और ट्रेन मे चड़ने से डरता है…..
मैं वो हूँ जो काम पे जाता है तो उसकी बीबी को लगता है कि जंग पे जा रहा है……

पता नही लौटेगा कि नही….

हर दो घंटे बाद फोन करती है…. चाइ पी कि नही.. खाना खाया कि नही

दरअसल वो ये जानना चाहती है कि मैं ज़िंदा हूँ कि नहीं….
मैं वो हूँ जो कभी बरसात मे फस्ता है कभी ब्लास्ट में
मैं वो हूँ जो किसी के हाथ मे तस्वीर देख के शक करता है

और मैं वो भी हूँ जो आजकल दाडी  बड़ाने और टोपी पहनने से डरता है…..
बिज़्नेस के लिए दुकान खरीदता है तो सोचता है दुकान का नाम क्या रखूं

कहीं दंगे मे नाम देख के मेरी दुकान ना जला दें……
झगड़ा किसी का भी हो…. बेवजह मरता मैं ही हूँ….

भीड़ तो देखी होगी ना अपनेभीड़ मे से कोई एक शकल चुन लीजिए….. मैं वो हूँ… “
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“पिछली बार ट्रेन मे मारा था, इस बार कही और मारेंगे..और तब तक मारते रहेंगे जब तक हम इन्हे जवाब देना नही सीखेंगे….

……. मैं साबित कुछ नही करना चाहतामैं सिर्फ़ आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि लोगों मे गुस्सा बहुत हैउन्हे आजमाना बंद कीजिए..
वी अरे रेबेलियन बाइ फोर्स नोट बाइ चाय्स…”

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” ग़लती हमारी हैहम लोग बहुत जल्दी यूज़्ड टू हो जाते हैं
एक ऐसा हादसा होता है तो चैनल बदल बदल के सारा माजरा देख लिया….

एस एमेस कर दिया फोन कियाशुकर मनाया कि हम लोग बच गये
फिर हम उस सिचुयेशन से लड़ने के बजये उसके साथ अड्जस्ट करना शुरू कर देते हैं..

पर हमारी भी मजबूरी है ना… हमे घर चलन होता है साहबइसीलिए हम सरकार चुनते हैं….कि वो मुल्क चलाए
………एक आदमी गुनहगार है कि नही इसको साबित करने के लिए आपको दस साल लग जाते हैं… 

आपको नही लगता कि ये आपकी काबिलियत पे सवाल है..?

आप जैसे लोग इन किडो का सफ़ाया नही करेंगे तो हमे झाड़ू उठानी होगी
लेकिन क्या है कि उस से हमारी इस सिविलाइज़्ड सोसाइटी का बॅलेन्स बीगाड़ जाएगा.. लेकिन क्या करें…”

 

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“मुझे यकीन है कि जो ब्लास्ट हुए वो एक टेररिस्ट आक्टिविटी नही थी… वो एक बहुत बड़ा सवाल था
और वो सवाल ये था कि.. हम तो तुम्हे इसी तरह मारेंगे… तुम क्या कर लोगे… येस थे आस्क्ड अज़ दिस क्वेस्चन…..”

 

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“तुम्हारा कोई जान पहचान वाला मारा था इस ब्लास्ट मे….?”

“क्योंमुझे उस दिन का इंतेजर करना चाहिए… जब मेरा कोई अपना बेवजह इस तरह कि जॅलील मौत मारे….

….. ये आक्सेप्टबल नही है…..”

 

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“कोई @#$%@#% बटन दबा के मेरे लिए ये फ़ैसला नही करेगा कि मुझे कब मरना है

मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा बच्चा घर से बाहर निकले तो बेखौफ़ घूमे कहीं भी कभी भी ट्रेन मे बस मे…. कही भी…..”

 

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“आम आदमी से यही उम्मीद क़ी जाती है… 

आम आदमी कि तरह जियो…. 

आम आदमी कि तरह बर्दाश्त करो… 

और आम आदमी कि तरह मरो….”

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कहता तो बहुत कुछ है…. पर क्या हम सुन पाए……?????

 

शेर

जाने किसके के शेर है….. पर अच्छे लगे सो बाँट रहा हूँ…….

कितना खुश्फहम कोई इंसान हो सकता है
कभी तन्हाई में, आईना उठा के देखो…..

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दबा के कब्र मे, सब चल दिए ! दुआना सलाम !
ज़रा सी देर मे, क्या हो गया जमाने को !

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दिल कि रग रग निचोड़ लेता है
इश्क़ मैं ये बड़ी मुसीबत है…..

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इक तुम्हारे रूठ जाने से
किसी को कुछ नहीं होता
फूल भी महकते हैं
रंग भी दमकते हैं
सूरज भी निकलता है 
तारे भी चमकते हैं
लेकिन इतना ज़रूर होता है
इक तुम्हारे रूठ जाने से
कोई हँसना भूल जाता है …!!

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हम नींद के शोक़ीन ज़्यादा नही लेकिन,
कुछ खवाब ना देखें तो गुज़ारा नही होता…….

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यूँ तो पत्थर क़ी भी तक़दीर बदल सकती है
शर्त यह है क़ी उसे दिल से तराशा जाए

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शेष फिर कभी…..

सुनना चाहें यदि तो…. क्लिक करें:

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आइए सुने एक नज़्म जो ना जाने किसने लिखी है… पर बहुत कुछ कहती है..

 

http://gauravsangtani.podomatic.com/enclosure/2008-08-17T12_38_15-07_00.mp3

राह आसान हो गई होगी 
जान पहचान हो गई होगी 

फिर पलट कर निगाह नहीं  
तुझ पे क़ुरबाँ हो गई होगी 

तेरी ज़ुल्फो को छेडती थी सबा 
खुद परेशाँ हो गई होगी 

उन से भी छीन लोगे याद अपनी 
जिन का ईमान हो गई होगी 

मरने वालो पे ‘सैफ‘ हैरत क्यों 
मौत आसान हो गई होगी 

– सैफुद्दीन सैफ 

बदनाम मेरे प्यार का अफ़साना हुआ है 
दीवाने भी कहते हैं की दीवाना हुआ है 

रिश्ता था तभी तो किसी बेदर्द ने तोड़ा
अपना था तभी तो को बेगाना हुआ है 

बादल की तरह  के बरस जाये इक दिन
दिल आप के होते हुए विराना हुआ है 

बजते हैं ख़यालों में तेरी याद के घुँगरू
कुछ दिन से मेरा घर भी परीखाना हुआ है

मौसम ने बनाया है निगाहों को शराबी
जिस फूल को देखूं वही पैमाना हुआ है

अज्ञात 

आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़ी सब दौलत और शौहरत,
मुझे बेनामी का सुकून लौटा दो….
अक्सर तुम्हे देखा है नुक्कड़ पे बच्चो के साथ फुटबाल खेलते,
मैं भी सनडे को साहब के साथ गोल्फ खेलने जाता हूँ…..

बोलो तो खेल बदल लें
आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़े सब ओहदे और तोहफे,
मुझे बेनामी का प्यार लौटा दो….
कल तुम्हे देखा था दीनू के घर का छप्पड़ डालते,
मैं भी कंप्यूटर पे इमारतों के ख़ाके खींचा करता हूँ….

बोलो तो ये काम बदल लें….
आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़े सब शिकवे और शिकायतें,
मुझे बेनामी का भोलापन लौटा दो…..
रोज शाम तुम्हे देखता हूँ मॅरी के साथ मरीन ड्राइव पे,
मैं भी रीना, टीना, गीता, रानी और आरती के साथ फ्राइडे नाइट पब मे जाता हूँ….

बोलो तो ये प्यार बदल लें….
आओ आज नाम बदल लें…!

ले लो इस नाम से जुड़े सब कसमे और वादे,
मुझे बेनामी का सीधापन लौटा दो…..
अक्सर तुम्हे पाता हूँ पान वाले, नन्हे नंदू और गंगा काकी से बतियाते,
मैं भी घंटो कान्फरेन्स कॉल पे बातें करता हूँ….

बोलो तो ये पहचान बदल लें
आओ आज नाम बदल लें…!

गौरव संगतानी

क्या लिखूं….

पैगाम लिखूं
तुझे जज़्बात लिखूं
या अपने ये हालात लिखूं….

क्या लिखूं….

रातें लिखूं
वो बातें लिखूं
या ठहरी हुई मुलाक़ातें लिखूं

क्या लिखूं….

जीत लिखूं
इसे हार लिखूं….
या प्यार का व्यापार लिखूं…..

क्या लिखूं….

तुझपे लिखूं
खुद को लिखूं….
या बेहतर है कुछ ना लिखूं…..

क्या लिखूं….

– गौरव संगतानी

गीले काग़ज़ क़ी तरह है ज़िंदगी अपनी,
कोई जलाता भी नहीं और कोई बुझाता भी नहीं |
इस कदर अकेले हो गये हैं आज कल,
कोई सताता भी नहीं और कोई मनाता भी नहीं ||
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आँखो मे महफूज़ रखना सितारों को,
राह मे कहीं ना कहीं रात होगी |
मुसाफिर तुम भी हो, मुसाफिर हम ही हैं,
किसी ना किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी ||
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पलकों के किनारे भिगोए ही नहीं,
वो सोचते हैं कि हम रोए ही नहीं |
वो पूछते हैं ख्वाबों मे किसे देखते हो,
और एक हम हैं कि एक उम्र से सोए ही नहीं ||
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दिल जीत ले वो जिगर हम भी रखते हैं,
कत्ल कर दे वो नज़र हम भी रखते हैं |
वादा किया है किसी को मुस्कराने का,
वरना आँखों मे समंदर हम भी रहते हैं ||
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परिंदों को मिलेंगी मंज़िलें,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं |
वही लोग रहते हैं खामोश अक्सर,
ज़माने मे जिनके हुनर बोलते हैं ||

दुआ

मैने खुदा से दुआ माँगी
 खुदा कोई तो ऐसा दे.. 
जो अंधेरो को उजालों मे बदल दे
जो उदास चेहरे पे मुस्कान ला दे
कोई तो ऐसा हो जो उम्मीद क़ी किरण जगाए
कोई जो फिर से हसीं लौटाए
इक शक्स ऐसा जो मझधार मे साथ ना छोड़े
इक साथी ऐसा जो अपने वादे ना तोड़े…..

मैने मुड़के देखा तो तुम खड़े थे

मुझे लगा मुझसे भूल हो गयी है…..
मेरी दुआ तो कब से कबूल हो गयी है…!

– गौरव संगतानी

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नही…….

 

एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूठ है आधा सच्चा सा…..
जज़्बाद को ढकके एक परदा बस,
एक बहाना अच्छा सा…..
जीवन का ऐसा साथी है,
जो दूर ना होके पास नही…….

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं, 
तुम कह देना कोई खास नही…….

– अज्ञात  

 

    कुछ शेर धुंधले से…. कहीं सुने थे कभी…. जिन्होने भी लिखे हैं उन्हे सलाम

    . तेरी याद मे जल रहा हूँ मैं,
    जहाँ तक रोशनी हो… चले आओ.. चले आओ…..!

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    . किस ज़ुबान से करें शिकवा हम उनके ना आने का,
    ये एहसान क्या कम है कि हमारे दिल मे रहते हैं…!

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    . उनकी मसरूफ़ियत ने बाँधे रखा होगा उन्हे,
    वरना क्या मज़ालवो हमे याद ना करें…!

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    . एक ज़रा सी बात पे बरसों के याराने गये
    हाँ मगर अच्छा हुआ कुछ लोग पहचाने गये…!

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    . तेरी बेवफ़ाई का शिकवा नही मुझे
    गिला तो तब हो जब तूने किसी से भी निभाई हो…!

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    .  खुदा अगर ये सच है 
    कि दिलों क़ी मोहब्बतो मे तू नज़र आता है…..
    तो क्यों टूटते हैं दिल….
    और खुद तेरा ही वज़ूद बिखर जाता है…..!

    …. शेष फिर कभी…..

हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया

कैसे मर-मर के गुज़ारी है तुम्हें क्या मालूम
रात भर तारों भरी रात पे रोना आया

कितने बेताब थे रिम झिम में पिएँगे लेकिन
आई बरसात तो बरसात पे रोना आया

कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

‘सैफ’ ये दिन तो क़यामत कि तरह गुज़रा है
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया

– सैफुद्दीन सैफ

आज अश्कों का तार टूट गया
रिश्ता-ए-इंतज़ार टूट गया

यूँ वो ठुकरा के चल दिए गोया
इक खिलौना था प्यार टूट गया

रोए रह-रह कर हिचकियाँ लेकर
साज़-ए-गम बार बार टूट गया

‘सैफ’ क्या चार दिन कि रंजिश से
इतनी मुद्दत का प्यार टूट गया

– सैफुद्दीन सैफ

खुदा हम को ऐसी खुदाई ना दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई ना दे

ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफाई ना दे

– बशीर बद्र

राज़

पास आकर भी फ़ासले क्यों हैं |
राज़ क्या है, समझ मे ये आया ||
उस को भी याद है कोई अब तक |
मैं भी तुमको भुला नही पाया ||

– जावेद अख़्तर

बस इक झिझक है यही हालदिल सुनाने में 
कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फसाने में 

इसी में इश्क़ की क़िस्मत बदल भी सकती थी 
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में 

कैफ़ी आज़मी

हो गयी है शाम, तेरी याद  रही है |
हर तरफ है धुन्ध, हर आस जा रही है ||
खो गया है अब तो मेरा खुद का वजूद भी,
ना जाने किस लिहाज़ से ये सांस  रही है||

तेरे दिए गम के साथ ही जिए जा रहा हूँ,
कैसे कर लूँ यकीन तेरी तरह छोड़ के ना जाएगा ये|
किसी और से ना उम्मीद ना गिला है कोई अब,
तेरे गम के दायरे मे ही ये उम्र जा रही है ||

गौरव संगतानी

रातों को चुपके से कोई साया आता है,
हवा का हर झोंका तेरी याद लाता है |
कब तक यूँ ही तपड़ता रहूँगा मैं,
क्यों हर बार मेरा मुक़द्दर मेरे दर से लौट जाता है ||

 गौरव संगतानी

जितना चाहा है तुम्हे…. वो चाहत कहाँ से लाओगे…!
चाहत मिल भी गयी तो ये दिल कहाँ से लाओगे..!
दिल ढूँढ भी लिया तुमने तो वो इतना जल नही पाएगा,
मैं फिर कहता हूँ….. जितना चाहा है तुम्हे कोई चाह नही पाएगा…!

गौरव संगतानी

रात तब नहीं होती जब अंधेरा  जाता है
रात तब होती है जब उज़ाला चला जाता है……
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

दर्द तब नहीं होता जब कोई भुला देता है,
दर्द तब होता है जब वो याद बहुत आता है……..
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

मैं तब नहीं थकता जब बहुत चल लेता हूँ,
मैं बहुत थक जाता हूँ जब खुद को अकेला पाता हूँ
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!


ज़ुल्म तब नहीं बढ़ता जब लोग बुरे हो जाते हैं,
ज़ुल्म तब बढ़ जाता है जब अच्छे लोग सो जाते हैं….
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

गौरव संगतानी

नज़्म उलझी हुई है सीने में, मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह, लफ्ज़ कागज पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ मैं जानम, सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है, इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी………..!

गुलज़ार

हमें अश्कों से ज़ख़्मों को धोना नही आता |

मिलती है खुशी तो उसे खोना नही आता ||

सह लेते हैं हर गम हस के ,

और वो कहते हैं कि हमें रोना नही आता…||

अग्यात

बहुत पहले लिखा था ये शेर, आज भी दिल के बहुत करीब है…..!

तेरी हर बात मानी है हमने,
अब ये ना कहना ऐ दिल धङकना छोङ दे |
दिल है तो धङकेगा,
दर्द होगा,
आँसू भी होंगे,
आँखों से ना कहना छलकना छोङ दे….!

– गौरव संगतानी

शीशा

सन्नाटे की मौत बर्दाश्त नहीं मुझे,
शीशा हूँ टूट कर भी खनक छोङ जाउँगा

– अग्यात

मंजिलें भी उसकी थी, रास्ता भी उसका था |
एक मैं अकेला था, काफिला भी उसका था |
साथ साथ चलने की सोच भी उसकी थी, फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था |
आज क्यों अकेला हूँ, दिल सवाल करता है |
लोग तो उसके थे, क्या खुदा भी उसका था…..!

– अग्यात

शाम

शाम होते ही चरागों को बुझा देता हूँ मैं,
इक दिल ही काफी है तेरी याद में जल जाने के लिए |

-अग्यात

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||

वो तेरा नजरे मिलाना और पलकें झुकाना याद है मुझे |
वो तेरा सब कुछ समझना और बच के निकलना याद है मुझे ||
मेरा आङों से तकना और तेरी नजरों का मुझको पकङना,
वो भरी दुपहरी छतों पे फिरना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

वो तेरी गलियों में मेरा भटकना याद है मुझे |
वो उन्हीं राहों से फिर फिर गुजरना याद है मुझे |
तेरी एक झलक को वो घन्टों नुक्कङ पे ठहरना,
फिर सब से बच बच के तुझको तकना याद है मुझे |

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

मेरे कहने से पहले तेरा सब कुछ समझना याद है मुझे |
मेरे इजहार-ए-मोहब्बत से तेरा हर पल डरना याद है मुझे |
तेरे खतों का वो लम्बा इंतजार,
और चन्द अलफ़ाज़ों में तेरा बहुत कुछ लिखना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

मेरी हर बात पे तेरा खिलखिला के हसना याद है मुझे |
इजहार करके तेरा खुद से ही बचना याद है मुझे |
अपनी तारीफ सुनकर तेरा वो शरमाना,
मेरे हर सवाल पे वो तेरा बाते बदलना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||

– गौरव संगतानी

(अभी और बहुत कुछ याद है मुझे…)

समझे नहीं जो खामोशी मेरी,
मेरे लब्जों को क्या समझेंगे |

बचते रहे उम्र भर साये से मेरे,
मेरे जख्मों को क्या समझेंगे |

भूल जाना यूँ तो नहीं है, रवायत मोहब्बत की |

समझे नहीं जो हालात मेरे,
इन रस्मों को क्या समझेंगे |

– गौरव संगतानी

जो होना है वो होता है,
तेरी मेरी बिसात कुछ भी नहीं.
मैं जो यूँ अक्सर उदास रहता हूँ,
बात इतनी सी है कि……… बात कुछ भी नहीं.

अज्ञात


(कहीं सुना था कभी)

जिंदगी हर पल बस यही सिखाती है,
चलने का नाम ही जिंदगानी है |
जो थम गया तो मिट गया,
दरिया सिर्फ बहता पानी है ||

– गौरव संगतानी

उंचाई

हे प्रभु…!
मुझे इतनी उंचाई कभी मत देना
गैरों को गले से लगा ना सकूँ
इतनी रुखाई कभी मत देना

– अटल बिहारी वाजपेयी

एक क्षणिका….!

जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा
‘अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |

उगते हुए सूरज की किरणें,
पँछियों की चहचहाहट,
खिलते हुए फूल,
सुबह की चाय की चुस्की,
स्कूल जाते बच्चों का शोर,
धान कूटती औरतों की गप्पें,
तंदूर से आती मकई की रोटी की महक,
शाम की चाय मठरी के साथ,
सब बर्बाद…!
अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |’
जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा

– गौरव संगतानी

कभी यूँ ही लिखा था कुछ तेरी याद मे, तेरी याद आयी तो फिर से गुनगुना दिया आज….

“दर्द की इंतहाँ हो गयी है यारों |
सुबह चले थे अब शाम हो गयी है यारों |
थक गयें हैं लेकिन कोई सहारा नहीं मिलता |
समंदर में मौजों को किनारा नहीं मिलता |
टूटा तो बहुत कुछ इस आसमां की झोली से |
इन पत्थरों में लेकिन कोई सितारा नहीं मिलता…”

बस यूँ ही….

– गौरव संगतानी

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
ढूँढता हूँ उस शख्स को, जिसे तूने कभी चाहा था |
अपने वादे न निभा पाया, उस गुनाहगार को ढूँढता हूँ |

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |

ढूँढता हूँ उन लम्हों को, जब करीब थे हम दोनो |
ढूँढता हूँ उन लब्जोँ को, जिन्हे उम्मीद थी मुझमें |
जिन पर साथ चले थे, उन राहों को ढूँढता हूँ |
बाँटी थी जो बातेँ, उन बातों को ढूँढता हूँ |

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
– गौरव संगतानी

ये कैसी है तेरे इश्क की जादूगरी,
अभी तू यहीँ है और नहीं अभी |
अभी तुझसे मिलकर हँसे थे हम,
अभी तुझे खोकर रो दिये भी |

तू ही तन्हाइयोँ में साथ मेरे,
तू ही भीङ में करे तन्हा |
तू ही तो ख्वाबोँ में है मेरे,
तू ही रातों को जगाये भी |

ये कैसी है तेरे इश्क की जादूगरी,
अभी तू यहीँ है और नहीं अभी |

– गौरव संगतानी

दर्द…

हम दर्द को दबाते रहेये फूट फूट निकलता रहा                              Dard
कभी चेहरे से झलकता रहा, कभी आँखों से छलकता रहा.

हम हर मोड़ पर पुकारा किए और वो हमसे बचके चलता रहा.
कितनी दफ़ा गिरे हम राहों मे वो बस दूर से तकता रहा.
हमेशा ख्वाब सा ही बनकर रहा मेरे लिए वो,
मैं हरदम पकड़ता रहा, वो ओस सा पिघलता रहा.

हम दर्द को दबाते रहेये फूट फूट निकलता रहा
कभी चेहरे से झलकता रहा, कभी आँखों से छलकता रहा.

गौरव संगतानी


काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
चाहत ये ना थी सब कुछ मिलेपर कभी कुछ तो मिला होता….

हर क़दम पे तेरे साथ चले थे हम,
किसी क़दम पे हमें भी इसका सिला मिला होता….

काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.

अब हम थक गये हैं इस चाहत से, इस जीने से.
मर जाते अगर कफ़न में तेरा आँचल मिला होता….

काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
चाहत ये ना थी सब कुछ मिलेपर कभी कुछ तो मिला होता….

गौरव संगतानी

सदियां….

जिसकी आँखों में टी थी सदियां
उसने सदियों की जुदाई दी है…..
 

तेरी आवाज़ सुनाई दी है..

गुलज़ार 


बहुत पहले लिखा था ये शेर, आज फिर याद  रहा है…..

आग बुझ गयीपर धुआँ अभी बाक़ी है.
हम कहते हैं इश्क़ नहींपर नशा अभी बाक़ी है.
नशे का क्या हैये तो उम्र भर रहेगा.
शुक्र है खुदा का, जान अभी बाक़ी है.

गौरव संगतानी

मोहब्बत पलकों पे कितने हसीं ख्वाब सजाती है..
फूलों से महकते ख्वाब..
सितारों से जगमगाते ख्वाब..
शबनम से बरसते ख्वाब..

फिर कभी यूँ भी होता है
की पलकों की डालियों से ख्वाबों के सारे परिंदे उड़ जाते हैं
और आँखें हैरान सी रह जाती हैं.

– जावेद अख़्तर