आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं
ज़ख़्म दिखते नहीं अभी लेकिन
ठंडे होगे तो दर्द निकलेगा
तैश उतरेगा वक्त का जब भी
चेहरा अंदर से ज़र्द निकलेगा
आज बिछड़े हैं…
कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं
आज बिछड़े हैं ..
कल जो आयेगा, जाने क्या होगा
बीत जाये जो कल नहीं आते
वक्त की शाख तोड़ने वालों
टूटी शाखों पे फल नहीं आते
आज बिछड़े हैं ..
कच्ची मिट्टी है, दिल भी इंसा भी
देखने ही में सख्त लगता है
आंसू पोंछे तो आंसुओं के निशां
खुश्क़ होने मे वक़्त लगता है
आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं
- गुलज़ार












कच्ची मिट्टी है, दिल भी इंसा भी
देखने ही में सख्त लगता है
आंसू पोंछे तो आंसुओं के निशां
खुश्क़ होने मे वक़्त लगता है
wah sir…..
kabhi gulzaar ki treveni se inspired hoke kuch likha tha,
‘बारिश’ पूरी कहाँ बह पाती है?
छतें अब भी गीली हैं देखो.
पलकें देखी तुमने मेरी?
I love gulzaar….
since ‘mora gora ang’ to….
‘dhan tan naaey’
and over….
अद्भुत सौन्दर्य है
—
Carbon Nanotube As Ideal Solar Cell
आंसू पोंछे तो आंसुओं के निशां
खुश्क़ होने मे वक़्त लगता है
यह पंक्तिया तो दिल को छु लेती हैं ..गुलजार की इस रचना के लिए बहुत आभार ..!!
कमाल की रचना …….वैसे मै भी गुलजार की रचनाये मुझे बेहद पसन्द है ……बहुत बहुत बहुत आभार….