दिल्ली धमाको क़ी खबर देखी तो कुछ सवाल से फिर से घूमने लगे जहन में….
सोचा कुछ लिखू…. पर याद आया कि कल ही एक फिल्म देखी थी ‘आ वेडनेसडे‘…..
उसमे नसारूद्दीन शाह के संवाद, काफ़ी हद तक बहुत कुछ बयान करते है….
उसी के अंश दे रहा हूँ…. कुछ भाग काट दिया है ताकि आपका फिल्म देखने का मज़ा खराब ना हो…
बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं….. क्या कहते हैं आप….?
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“ आपके घर मे कोकरोच आता है तो आप क्या करते हैं साहब…. उसे पालते नही मारते हैं….. “
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“तुम हो कौन..?”
“मैं वो हूँ आज बस और ट्रेन मे चड़ने से डरता है…..
मैं वो हूँ जो काम पे जाता है तो उसकी बीबी को लगता है कि जंग पे जा रहा है……
पता नही लौटेगा कि नही….
हर दो घंटे बाद फोन करती है…. चाइ पी कि नही.. खाना खाया कि नही…
दरअसल वो ये जानना चाहती है कि मैं ज़िंदा हूँ कि नहीं….
मैं वो हूँ जो कभी बरसात मे फस्ता है कभी ब्लास्ट में…
मैं वो हूँ जो किसी के हाथ मे तस्वीर देख के शक करता है…
और मैं वो भी हूँ जो आजकल दाडी बड़ाने और टोपी पहनने से डरता है…..
बिज़्नेस के लिए दुकान खरीदता है तो सोचता है दुकान का नाम क्या रखूं…
कहीं दंगे मे नाम देख के मेरी दुकान ना जला दें……
झगड़ा किसी का भी हो…. बेवजह मरता मैं ही हूँ….
भीड़ तो देखी होगी ना अपने… भीड़ मे से कोई एक शकल चुन लीजिए….. मैं वो हूँ… “
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“पिछली बार ट्रेन मे मारा था, इस बार कही और मारेंगे..और तब तक मारते रहेंगे जब तक हम इन्हे जवाब देना नही सीखेंगे….
……. मैं साबित कुछ नही करना चाहता… मैं सिर्फ़ आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि लोगों मे गुस्सा बहुत है… उन्हे आजमाना बंद कीजिए..
वी अरे रेबेलियन बाइ फोर्स नोट बाइ चाय्स…”
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” ग़लती हमारी है… हम लोग बहुत जल्दी यूज़्ड टू हो जाते हैं…
एक ऐसा हादसा होता है तो चैनल बदल बदल के सारा माजरा देख लिया….
एस एमेस कर दिया फोन किया… शुकर मनाया कि हम लोग बच गये…
फिर हम उस सिचुयेशन से लड़ने के बजये उसके साथ अड्जस्ट करना शुरू कर देते हैं..
पर हमारी भी मजबूरी है ना… हमे घर चलन होता है साहब, इसीलिए हम सरकार चुनते हैं….कि वो मुल्क चलाए…
………एक आदमी गुनहगार है कि नही इसको साबित करने के लिए आपको दस साल लग जाते हैं…
आपको नही लगता कि ये आपकी काबिलियत पे सवाल है..?
आप जैसे लोग इन किडो का सफ़ाया नही करेंगे तो हमे झाड़ू उठानी होगी
लेकिन क्या है कि उस से हमारी इस सिविलाइज़्ड सोसाइटी का बॅलेन्स बीगाड़ जाएगा.. लेकिन क्या करें…”
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“मुझे यकीन है कि जो ब्लास्ट हुए वो एक टेररिस्ट आक्टिविटी नही थी… वो एक बहुत बड़ा सवाल था…
और वो सवाल ये था कि.. हम तो तुम्हे इसी तरह मारेंगे… तुम क्या कर लोगे… येस थे आस्क्ड अज़ दिस क्वेस्चन…..”
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“तुम्हारा कोई जान पहचान वाला मारा था इस ब्लास्ट मे….?”
“क्यों? मुझे उस दिन का इंतेजर करना चाहिए… जब मेरा कोई अपना बेवजह इस तरह कि जॅलील मौत मारे….
….. ये आक्सेप्टबल नही है…..”
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“कोई @#$%@#% बटन दबा के मेरे लिए ये फ़ैसला नही करेगा कि मुझे कब मरना है…
मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा बच्चा घर से बाहर निकले तो बेखौफ़ घूमे कहीं भी कभी भी ट्रेन मे बस मे…. कही भी…..”
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“आम आदमी से यही उम्मीद क़ी जाती है…
आम आदमी कि तरह जियो….
आम आदमी कि तरह बर्दाश्त करो…
और आम आदमी कि तरह मरो….”
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कहता तो बहुत कुछ है…. पर क्या हम सुन पाए……?????











