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Archive for June 16th, 2008

गीले काग़ज़ क़ी तरह है ज़िंदगी अपनी,कोई जलाता भी नहीं और कोई बुझाता भी नहीं |इस कदर अकेले हो गये हैं आज कल,कोई सताता भी नहीं और कोई मनाता भी नहीं ||___________________________________आँखो मे महफूज़ रखना सितारों को,राह मे कहीं ना कहीं रात होगी |मुसाफिर तुम भी हो, मुसाफिर हम ही हैं,किसी ना किसी मोड़ पर [...]

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