हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया
कैसे मर-मर के गुज़ारी है तुम्हें क्या मालूम
रात भर तारों भरी रात पे रोना आया
कितने बेताब थे रिम झिम में पिएँगे लेकिन
आई बरसात तो बरसात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
‘सैफ’ ये दिन तो क़यामत कि तरह गुज़रा है
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया
- सैफुद्दीन सैफ












कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
छू जाने वाली कविता
सैफुद्दीन सैफ साः का यह कलाम मेरा पसंदीदा है, आभार.
कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
wah bahut hi badhiya
Thanks for posting it here
and that too with author’s name.
Thanks once again.