जो होना है वो होता है,
तेरी मेरी बिसात कुछ भी नहीं.
मैं जो यूँ अक्सर उदास रहता हूँ,
बात इतनी सी है कि……… बात कुछ भी नहीं.
- अज्ञात
(कहीं सुना था कभी)
Posted in Blogroll, dreams, ख्वाब on October 20, 2007 | 1 Comment »
जो होना है वो होता है,
तेरी मेरी बिसात कुछ भी नहीं.
मैं जो यूँ अक्सर उदास रहता हूँ,
बात इतनी सी है कि……… बात कुछ भी नहीं.
- अज्ञात
(कहीं सुना था कभी)
Posted in dreams, gaurav, ख्वाब on October 19, 2007 | 1 Comment »
जिंदगी हर पल बस यही सिखाती है,
चलने का नाम ही जिंदगानी है |
जो थम गया तो मिट गया,
दरिया सिर्फ बहता पानी है ||
- गौरव संगतानी
Posted in ख्वाब on October 16, 2007 | 2 Comments »
हे प्रभु…!
मुझे इतनी उंचाई कभी मत देना
गैरों को गले से लगा ना सकूँ
इतनी रुखाई कभी मत देना
- अटल बिहारी वाजपेयी
Posted in dreams, gaurav, ख्वाब on October 15, 2007 | Leave a Comment »
एक क्षणिका….!
जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा
‘अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |
उगते हुए सूरज की किरणें,
पँछियों की चहचहाहट,
खिलते हुए फूल,
सुबह की चाय की चुस्की,
स्कूल जाते बच्चों का शोर,
धान कूटती औरतों की गप्पें,
तंदूर से आती मकई की रोटी की महक,
शाम की चाय [...]
Posted in Blogroll, dreams, gaurav, ख्वाब on October 14, 2007 | 1 Comment »
कभी यूँ ही लिखा था कुछ तेरी याद मे, तेरी याद आयी तो फिर से गुनगुना दिया आज….
“दर्द की इंतहाँ हो गयी है यारों |
सुबह चले थे अब शाम हो गयी है यारों |
थक गयें हैं लेकिन कोई सहारा नहीं मिलता |
समंदर में मौजों को किनारा नहीं मिलता |
टूटा तो बहुत कुछ इस आसमां की [...]
Posted in ख्वाब on October 14, 2007 | 6 Comments »
तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
ढूँढता हूँ उस शख्स को, जिसे तूने कभी चाहा था |
अपने वादे न निभा पाया, उस गुनाहगार को ढूँढता हूँ |
तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
ढूँढता हूँ उन [...]
ये कैसी है तेरे इश्क की जादूगरी,
अभी तू यहीँ है और नहीं अभी |
अभी तुझसे मिलकर हँसे थे हम,
अभी तुझे खोकर रो दिये भी |
तू ही तन्हाइयोँ में साथ मेरे,
तू ही भीङ में करे तन्हा |
तू ही तो ख्वाबोँ में है मेरे,
तू ही रातों को जगाये भी |
ये कैसी है तेरे इश्क की जादूगरी,
अभी तू [...]
हम दर्द को दबाते रहे, ये फूट फूट निकलता रहा
कभी चेहरे से झलकता रहा, कभी आँखों से छलकता रहा.
हम हर मोड़ पर पुकारा किए और वो हमसे बचके चलता रहा.
कितनी दफ़ा गिरे हम राहों मे वो बस दूर से तकता रहा.
हमेशा ख्वाब सा ही बनकर रहा मेरे लिए वो,
मैं हरदम पकड़ता रहा, वो ओस सा पिघलता रहा.
हम दर्द को दबाते रहे, ये फूट फूट निकलता रहा
कभी चेहरे से झलकता रहा, कभी आँखों से छलकता रहा.
- गौरव संगतानी