तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
जब कोई आहट ना हुई, ना ही कोई दस्तक दी तुमने,
कैसे चले आए इस दिल में, दिल को संभालूं कैसे..
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
राह में बहुत दूर तक, तू हर पल साथ चला था मेरे,
आज फिर से ज़रूरत है तेरी, तुझको पुकारूँ कैसे…….
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
ज़िंदगी बहुत कुछ कट गयी है, तेरी उम्मीदों के सहारे,
बहुत बाक़ी है जीवन, उम्मीदों को उभारू कैसे……
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
- गौरव संगतानी
Archive for August, 2007
तेरे बिन……
Posted in dreams, ख्वाब on August 26, 2007 | Leave a Comment »
दिल मानता नहीं…..
Posted in dreams, ख्वाब on August 18, 2007 | 1 Comment »
जीवन हर पल कुछ सिखाना चाहता है,
एक नयी सीख, एक नया सबक…
पर ना जाने क्यूं ये दिल कुछ सीखना ही नही चाहता, कुछ समझना ही नहीं चाहता…..
या मानूं तो, जो दिख रहा है, उसे स्वीकरना नही चाहता…..
पर हमारे स्वीकारने या ठुकराने से सच बदल तो नही जाता…
ये पक्क्तियाँ जो कभी यूँ ही लिखी थी… आज सच होती दिखती हैं….
दिल मानता नही इसे आदत है चोट खाने की….
कितनी दफ़ा कोशिश की हमने इसे समझाने की…..
बहुत कुछ सीखा है इसने तुमसे पर इक बात सीख ना पाया……
इसे आदत नहीं यूँ ही भूल जाने की…..
- गौरव संगतानी
मुट्ठी भरी रेत की……
Posted in dreams, ख्वाब on August 13, 2007 | Leave a Comment »
समय यूँही चला जाता है और हम देखते रह जाते हैं,
वैसे ही जैसे मुट्ठी मे भरी रेत………
कितनी ही कोशिश करे कोई, कितना ही कस के पकड़े…. धीरे धीरे हाथ ख़ाली रह जाता है…..
इसी रेत की तरह है वक़्त…………..
लम्हों को कितना ही रोकना चाहो, यादों को कितना ही सहेजना चाहो….
कुछ हाथ नहीं आता……..
शायद तभी लोग केहते हैं…..
जब अच्छा वक़्त नही रहा तो बुरा भी नहीं रहेगा….
वक़्त कैसा भी रहा हो यादें छोड़ जाता है…………………..
- गौरव संगतानी
कुछ शब्द भटके से……
Posted in dreams, ख्वाब on August 10, 2007 | Leave a Comment »
तेरे ग़म की डलि उठा के मुँह मे रख ली है मैने
ये कतरा कतरा पिघल रही है
मैं कतरा कतरा जी रहा हूँ……………
- गुलज़ार











