November 27, 2009 by Gaurav Sangtani
हत्थां दा लिख्या लक्ख मिटाए कोई,
हत्थां ते लिख्या नहीं मिटदा…..
लक्ख करें जतन तू जट्टा,
किस्मत दा लिख्या नहीं मुकदा….
लोकी पराये हो गए,
ते हुए अपने बेगाने…
किस्मत दा ए रोला सारा,
ऎंवे कोई नहीं बदलदा….
हत्थां ते लिख्या नहीं मिटदा…..
किस्मत दा लिख्या नहीं मुकदा….
- गौरव संगतानी
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November 26, 2009 by Gaurav Sangtani
खुद में उलझ के रह गयी, ये जिंदगी की दास्ताँ..
कोई ओर नहीं कोई छोर नहीं, न संग कोई कारवां….
- गौरव संगतानी
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September 13, 2009 by Gaurav Sangtani
आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं
ज़ख़्म दिखते नहीं अभी लेकिन
ठंडे होगे तो दर्द निकलेगा
तैश उतरेगा वक्त का जब भी
चेहरा अंदर से ज़र्द निकलेगा
आज बिछड़े हैं…
कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं
आज बिछड़े हैं ..
कल जो आयेगा, जाने क्या होगा
बीत जाये जो कल नहीं आते
वक्त की शाख तोड़ने वालों
टूटी शाखों पे फल नहीं आते
आज बिछड़े हैं ..
कच्ची मिट्टी है, दिल भी इंसा भी
देखने ही में सख्त लगता है
आंसू पोंछे तो आंसुओं के निशां
खुश्क़ होने मे वक़्त लगता है
आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं
जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं
- गुलज़ार
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July 13, 2009 by Gaurav Sangtani
भीनी भीनी सी खुशबु तेरी,
महका महका सा एहसास है… |
एक अरसा हुआ तुझको देखे हुए…
पर तू हर लम्हा मेरे पास है…. ||
- गौरव संगतानी
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April 25, 2009 by Gaurav Sangtani
जिंदगी यूँ चली, होके खुद से खफ़ा |
पाके भी खो दिया, हमने सब हर दफ़ा ||
कोई साथी नहीं, कोई संग ना चला |
दर्द की रह में, हँसी हुई बेवफा ||
- गौरव संगतानी
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January 30, 2009 by Gaurav Sangtani
कैसे कह दूं कि तेरी याद नही आती है,
मेरी हर सांस मे बस तू ही महकाती है.
आज भी रातों को जब चौंक के उठता हूँ,
बस तू ही नही, हर शह तो नज़र आती है..!
- गौरव संगतानी
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November 8, 2008 by Gaurav Sangtani
कितनी दफा हम पूछते हैं न….. आख़िर क्यूँ..???
कुछ बातों का कोई कारण नही होता
कोई अर्थ नहीं होता
कोई तर्क नहीं होता
आप स्वीकारें न स्वीकारें….
कोई फर्क नही होता….!!!
कुछ सवालों का कोई जवाब नही होता
कोई शुरुआत नही होती
कोई अंत नहीं होता
आप कितना ही पूछें…
कोई हल नहीं होता….!!!
कुछ रास्तों की कोई मंजिल नहीं होती
कोई आसरा नही होता
कोई ठिकाना नहीं होता
आप कितना ही चलतें रहें….
कोई साथी कोई सहारा नहीं होता…..!!!
और कुछ ज़ज्बातों के लिए लफ्ज़ नहीं होते….. बस कुछ नहीं होता…!!!
- गौरव संगतानी
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September 14, 2008 by Gaurav Sangtani
दिल्ली धमाको क़ी खबर देखी तो कुछ सवाल से फिर से घूमने लगे जहन में….
सोचा कुछ लिखू…. पर याद आया कि कल ही एक फिल्म देखी थी ‘आ वेडनेसडे‘…..
उसमे नसारूद्दीन शाह के संवाद, काफ़ी हद तक बहुत कुछ बयान करते है….
उसी के अंश दे रहा हूँ…. कुछ भाग काट दिया है ताकि आपका फिल्म देखने का मज़ा खराब ना हो…
बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं….. क्या कहते हैं आप….?
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“ आपके घर मे कोकरोच आता है तो आप क्या करते हैं साहब…. उसे पालते नही मारते हैं….. “
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“तुम हो कौन..?”
“मैं वो हूँ आज बस और ट्रेन मे चड़ने से डरता है…..
मैं वो हूँ जो काम पे जाता है तो उसकी बीबी को लगता है कि जंग पे जा रहा है……
पता नही लौटेगा कि नही….
हर दो घंटे बाद फोन करती है…. चाइ पी कि नही.. खाना खाया कि नही…
दरअसल वो ये जानना चाहती है कि मैं ज़िंदा हूँ कि नहीं….
मैं वो हूँ जो कभी बरसात मे फस्ता है कभी ब्लास्ट में…
मैं वो हूँ जो किसी के हाथ मे तस्वीर देख के शक करता है…
और मैं वो भी हूँ जो आजकल दाडी बड़ाने और टोपी पहनने से डरता है…..
बिज़्नेस के लिए दुकान खरीदता है तो सोचता है दुकान का नाम क्या रखूं…
कहीं दंगे मे नाम देख के मेरी दुकान ना जला दें……
झगड़ा किसी का भी हो…. बेवजह मरता मैं ही हूँ….
भीड़ तो देखी होगी ना अपने… भीड़ मे से कोई एक शकल चुन लीजिए….. मैं वो हूँ… “
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“पिछली बार ट्रेन मे मारा था, इस बार कही और मारेंगे..और तब तक मारते रहेंगे जब तक हम इन्हे जवाब देना नही सीखेंगे….
……. मैं साबित कुछ नही करना चाहता… मैं सिर्फ़ आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि लोगों मे गुस्सा बहुत है… उन्हे आजमाना बंद कीजिए..
वी अरे रेबेलियन बाइ फोर्स नोट बाइ चाय्स…”
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” ग़लती हमारी है… हम लोग बहुत जल्दी यूज़्ड टू हो जाते हैं…
एक ऐसा हादसा होता है तो चैनल बदल बदल के सारा माजरा देख लिया….
एस एमेस कर दिया फोन किया… शुकर मनाया कि हम लोग बच गये…
फिर हम उस सिचुयेशन से लड़ने के बजये उसके साथ अड्जस्ट करना शुरू कर देते हैं..
पर हमारी भी मजबूरी है ना… हमे घर चलन होता है साहब, इसीलिए हम सरकार चुनते हैं….कि वो मुल्क चलाए…
………एक आदमी गुनहगार है कि नही इसको साबित करने के लिए आपको दस साल लग जाते हैं…
आपको नही लगता कि ये आपकी काबिलियत पे सवाल है..?
आप जैसे लोग इन किडो का सफ़ाया नही करेंगे तो हमे झाड़ू उठानी होगी
लेकिन क्या है कि उस से हमारी इस सिविलाइज़्ड सोसाइटी का बॅलेन्स बीगाड़ जाएगा.. लेकिन क्या करें…”
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“मुझे यकीन है कि जो ब्लास्ट हुए वो एक टेररिस्ट आक्टिविटी नही थी… वो एक बहुत बड़ा सवाल था…
और वो सवाल ये था कि.. हम तो तुम्हे इसी तरह मारेंगे… तुम क्या कर लोगे… येस थे आस्क्ड अज़ दिस क्वेस्चन…..”
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“तुम्हारा कोई जान पहचान वाला मारा था इस ब्लास्ट मे….?”
“क्यों? मुझे उस दिन का इंतेजर करना चाहिए… जब मेरा कोई अपना बेवजह इस तरह कि जॅलील मौत मारे….
….. ये आक्सेप्टबल नही है…..”
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“कोई @#$%@#% बटन दबा के मेरे लिए ये फ़ैसला नही करेगा कि मुझे कब मरना है…
मैं चाहता हूँ कि अगर मेरा बच्चा घर से बाहर निकले तो बेखौफ़ घूमे कहीं भी कभी भी ट्रेन मे बस मे…. कही भी…..”
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“आम आदमी से यही उम्मीद क़ी जाती है…
आम आदमी कि तरह जियो….
आम आदमी कि तरह बर्दाश्त करो…
और आम आदमी कि तरह मरो….”
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कहता तो बहुत कुछ है…. पर क्या हम सुन पाए……?????
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August 20, 2008 by Gaurav Sangtani
जाने किसके के शेर है….. पर अच्छे लगे सो बाँट रहा हूँ…….
कितना खुश्फहम कोई इंसान हो सकता है…
कभी तन्हाई में, आईना उठा के देखो…..
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दबा के कब्र मे, सब चल दिए ! दुआ, ना सलाम !
ज़रा सी देर मे, क्या हो गया जमाने को !
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दिल कि रग रग निचोड़ लेता है
इश्क़ मैं ये बड़ी मुसीबत है…..
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इक तुम्हारे रूठ जाने से
किसी को कुछ नहीं होता
फूल भी महकते हैं
रंग भी दमकते हैं
सूरज भी निकलता है
तारे भी चमकते हैं
लेकिन इतना ज़रूर होता है
इक तुम्हारे रूठ जाने से
कोई हँसना भूल जाता है …!!
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हम नींद के शोक़ीन ज़्यादा नही लेकिन,
कुछ खवाब ना देखें तो गुज़ारा नही होता…….
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यूँ तो पत्थर क़ी भी तक़दीर बदल सकती है
शर्त यह है क़ी उसे दिल से तराशा जाए
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शेष फिर कभी…..
सुनना चाहें यदि तो…. क्लिक करें:
http://gauravsangtani.podomatic.com/enclosure/2008-08-20T11_53_00-07_00.mp3
http://gauravsangtani.podomatic.com/
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July 29, 2008 by Gaurav Sangtani
राह आसान हो गई होगी
जान पहचान हो गई होगी
फिर पलट कर निगाह नहीं आई
तुझ पे क़ुरबाँ हो गई होगी
तेरी ज़ुल्फो को छेडती थी सबा
खुद परेशाँ हो गई होगी
उन से भी छीन लोगे याद अपनी
जिन का ईमान हो गई होगी
मरने वालो पे ’सैफ‘ हैरत क्यों
मौत आसान हो गई होगी
- सैफुद्दीन सैफ
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July 3, 2008 by Gaurav Sangtani
बदनाम मेरे प्यार का अफ़साना हुआ है
दीवाने भी कहते हैं की दीवाना हुआ है
रिश्ता था तभी तो किसी बेदर्द ने तोड़ा
अपना था तभी तो कोई बेगाना हुआ है
बादल की तरह आ के बरस जाये इक दिन
दिल आप के होते हुए विराना हुआ है
बजते हैं ख़यालों में तेरी याद के घुँगरू
कुछ दिन से मेरा घर भी परीखाना हुआ है
मौसम ने बनाया है निगाहों को शराबी
जिस फूल को देखूं वही पैमाना हुआ है
- अज्ञात
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June 26, 2008 by Gaurav Sangtani
आओ आज नाम बदल लें…!
ले लो इस नाम से जुड़ी सब दौलत और शौहरत,
मुझे बेनामी का सुकून लौटा दो….
अक्सर तुम्हे देखा है नुक्कड़ पे बच्चो के साथ फुटबाल खेलते,
मैं भी सनडे को साहब के साथ गोल्फ खेलने जाता हूँ…..
बोलो तो खेल बदल लें…
आओ आज नाम बदल लें…!
ले लो इस नाम से जुड़े सब ओहदे और तोहफे,
मुझे बेनामी का प्यार लौटा दो….
कल तुम्हे देखा था दीनू के घर का छप्पड़ डालते,
मैं भी कंप्यूटर पे इमारतों के ख़ाके खींचा करता हूँ….
बोलो तो ये काम बदल लें….
आओ आज नाम बदल लें…!
ले लो इस नाम से जुड़े सब शिकवे और शिकायतें,
मुझे बेनामी का भोलापन लौटा दो…..
रोज शाम तुम्हे देखता हूँ मॅरी के साथ मरीन ड्राइव पे,
मैं भी रीना, टीना, गीता, रानी और आरती के साथ फ्राइडे नाइट पब मे जाता हूँ….
बोलो तो ये प्यार बदल लें….
आओ आज नाम बदल लें…!
ले लो इस नाम से जुड़े सब कसमे और वादे,
मुझे बेनामी का सीधापन लौटा दो…..
अक्सर तुम्हे पाता हूँ पान वाले, नन्हे नंदू और गंगा काकी से बतियाते,
मैं भी घंटो कान्फरेन्स कॉल पे बातें करता हूँ….
बोलो तो ये पहचान बदल लें…
आओ आज नाम बदल लें…!
- गौरव संगतानी
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June 24, 2008 by Gaurav Sangtani
क्या लिखूं….
पैगाम लिखूं…
तुझे जज़्बात लिखूं…
या अपने ये हालात लिखूं….
क्या लिखूं….
रातें लिखूं…
वो बातें लिखूं…
या ठहरी हुई मुलाक़ातें लिखूं…
क्या लिखूं….
जीत लिखूं…
इसे हार लिखूं….
या प्यार का व्यापार लिखूं…..
क्या लिखूं….
तुझपे लिखूं…
खुद को लिखूं….
या बेहतर है कुछ ना लिखूं…..
क्या लिखूं….
- गौरव संगतानी
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June 16, 2008 by Gaurav Sangtani
गीले काग़ज़ क़ी तरह है ज़िंदगी अपनी,
कोई जलाता भी नहीं और कोई बुझाता भी नहीं |
इस कदर अकेले हो गये हैं आज कल,
कोई सताता भी नहीं और कोई मनाता भी नहीं ||
___________________________________
आँखो मे महफूज़ रखना सितारों को,
राह मे कहीं ना कहीं रात होगी |
मुसाफिर तुम भी हो, मुसाफिर हम ही हैं,
किसी ना किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी ||
________________________________
पलकों के किनारे भिगोए ही नहीं,
वो सोचते हैं कि हम रोए ही नहीं |
वो पूछते हैं ख्वाबों मे किसे देखते हो,
और एक हम हैं कि एक उम्र से सोए ही नहीं ||
__________________________________
दिल जीत ले वो जिगर हम भी रखते हैं,
कत्ल कर दे वो नज़र हम भी रखते हैं |
वादा किया है किसी को मुस्कराने का,
वरना आँखों मे समंदर हम भी रहते हैं ||
_________________________________
परिंदों को मिलेंगी मंज़िलें,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं |
वही लोग रहते हैं खामोश अक्सर,
ज़माने मे जिनके हुनर बोलते हैं ||
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June 11, 2008 by Gaurav Sangtani
मैने खुदा से दुआ माँगी…
ए खुदा कोई तो ऐसा दे..
जो अंधेरो को उजालों मे बदल दे
जो उदास चेहरे पे मुस्कान ला दे
कोई तो ऐसा हो जो उम्मीद क़ी किरण जगाए
कोई जो फिर से हसीं लौटाए
इक शक्स ऐसा जो मझधार मे साथ ना छोड़े
इक साथी ऐसा जो अपने वादे ना तोड़े…..
मैने मुड़के देखा तो तुम खड़े थे…
मुझे लगा मुझसे भूल हो गयी है…..
मेरी दुआ तो कब से कबूल हो गयी है…!
- गौरव संगतानी
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June 7, 2008 by Gaurav Sangtani
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नही…….
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा,
एक झूठ है आधा सच्चा सा…..
जज़्बाद को ढकके एक परदा बस,
एक बहाना अच्छा सा…..
जीवन का ऐसा साथी है,
जो दूर ना होके पास नही…….
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
तुम कह देना कोई खास नही…….
- अज्ञात
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June 5, 2008 by Gaurav Sangtani
कुछ शेर धुंधले से…. कहीं सुने थे कभी…. जिन्होने भी लिखे हैं उन्हे सलाम…
१. तेरी याद मे जल रहा हूँ मैं,
जहाँ तक रोशनी हो… चले आओ.. चले आओ…..!
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२. किस ज़ुबान से करें शिकवा हम उनके ना आने का,
ये एहसान क्या कम है कि हमारे दिल मे रहते हैं…!
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३. उनकी मसरूफ़ियत ने बाँधे रखा होगा उन्हे,
वरना क्या मज़ाल… वो हमे याद ना करें…!
____________________________________________
४. एक ज़रा सी बात पे बरसों के याराने गये…
हाँ मगर अच्छा हुआ कुछ लोग पहचाने गये…!
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५. तेरी बेवफ़ाई का शिकवा नही मुझे…
गिला तो तब हो जब तूने किसी से भी निभाई हो…!
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६. ए खुदा अगर ये सच है
कि दिलों क़ी मोहब्बतो मे तू नज़र आता है…..
तो क्यों टूटते हैं दिल….
और खुद तेरा ही वज़ूद बिखर जाता है…..!
…. शेष फिर कभी…..
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June 1, 2008 by Gaurav Sangtani
हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया
कैसे मर-मर के गुज़ारी है तुम्हें क्या मालूम
रात भर तारों भरी रात पे रोना आया
कितने बेताब थे रिम झिम में पिएँगे लेकिन
आई बरसात तो बरसात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
‘सैफ’ ये दिन तो क़यामत कि तरह गुज़रा है
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया
- सैफुद्दीन सैफ
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May 31, 2008 by Gaurav Sangtani
आज अश्कों का तार टूट गया
रिश्ता-ए-इंतज़ार टूट गया
यूँ वो ठुकरा के चल दिए गोया
इक खिलौना था प्यार टूट गया
रोए रह-रह कर हिचकियाँ लेकर
साज़-ए-गम बार बार टूट गया
‘सैफ’ क्या चार दिन कि रंजिश से
इतनी मुद्दत का प्यार टूट गया
- सैफुद्दीन सैफ
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May 28, 2008 by Gaurav Sangtani
खुदा हम को ऐसी खुदाई ना दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई ना दे
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफाई ना दे
- बशीर बद्र
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May 26, 2008 by Gaurav Sangtani
पास आकर भी फ़ासले क्यों हैं |
राज़ क्या है, समझ मे ये आया ||
उस को भी याद है कोई अब तक |
मैं भी तुमको भुला नही पाया ||
- जावेद अख़्तर
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May 25, 2008 by Gaurav Sangtani
बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में
कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फसाने में
इसी में इश्क़ की क़िस्मत बदल भी सकती थी
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में
- कैफ़ी आज़मी
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April 26, 2008 by Gaurav Sangtani
हो गयी है शाम, तेरी याद आ रही है |
हर तरफ है धुन्ध, हर आस जा रही है ||
खो गया है अब तो मेरा खुद का वजूद भी,
ना जाने किस लिहाज़ से ये सांस आ रही है||
तेरे दिए गम के साथ ही जिए जा रहा हूँ,
कैसे कर लूँ यकीन तेरी तरह छोड़ के ना जाएगा ये|
किसी और से ना उम्मीद ना गिला है कोई अब,
तेरे गम के दायरे मे ही ये उम्र जा रही है ||
- गौरव संगतानी
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April 13, 2008 by Gaurav Sangtani
रातों को चुपके से कोई साया आता है,
हवा का हर झोंका तेरी याद लाता है |
कब तक यूँ ही तपड़ता रहूँगा मैं,
क्यों हर बार मेरा मुक़द्दर मेरे दर से लौट जाता है ||
गौरव संगतानी
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April 9, 2008 by Gaurav Sangtani
जितना चाहा है तुम्हे…. वो चाहत कहाँ से लाओगे…!
चाहत मिल भी गयी तो ये दिल कहाँ से लाओगे..!
दिल ढूँढ भी लिया तुमने तो वो इतना जल नही पाएगा,
मैं फिर कहता हूँ….. जितना चाहा है तुम्हे कोई चाह नही पाएगा…!
- गौरव संगतानी
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March 23, 2008 by Gaurav Sangtani
रात तब नहीं होती जब अंधेरा आ जाता है,
रात तब होती है जब उज़ाला चला जाता है……
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!
दर्द तब नहीं होता जब कोई भुला देता है,
दर्द तब होता है जब वो याद बहुत आता है……..
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!
मैं तब नहीं थकता जब बहुत चल लेता हूँ,
मैं बहुत थक जाता हूँ जब खुद को अकेला पाता हूँ…
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!
ज़ुल्म तब नहीं बढ़ता जब लोग बुरे हो जाते हैं,
ज़ुल्म तब बढ़ जाता है जब अच्छे लोग सो जाते हैं….
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!
- गौरव संगतानी
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March 15, 2008 by Gaurav Sangtani
नज़्म उलझी हुई है सीने में, मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह, लफ्ज़ कागज पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ मैं जानम, सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है, इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी………..!
- गुलज़ार
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March 7, 2008 by Gaurav Sangtani
हमें अश्कों से ज़ख़्मों को धोना नही आता |
मिलती है खुशी तो उसे खोना नही आता ||
सह लेते हैं हर गम हस के ,
और वो कहते हैं कि हमें रोना नही आता…||
- अग्यात
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February 5, 2008 by Gaurav Sangtani
बहुत पहले लिखा था ये शेर, आज भी दिल के बहुत करीब है…..!
तेरी हर बात मानी है हमने,
अब ये ना कहना ऐ दिल धङकना छोङ दे |
दिल है तो धङकेगा,
दर्द होगा,
आँसू भी होंगे,
आँखों से ना कहना छलकना छोङ दे….!
- गौरव संगतानी
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December 14, 2007 by Gaurav Sangtani
सन्नाटे की मौत बर्दाश्त नहीं मुझे,
शीशा हूँ टूट कर भी खनक छोङ जाउँगा
- अग्यात
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November 28, 2007 by Gaurav Sangtani
मंजिलें भी उसकी थी, रास्ता भी उसका था |
एक मैं अकेला था, काफिला भी उसका था |
साथ साथ चलने की सोच भी उसकी थी, फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था |
आज क्यों अकेला हूँ, दिल सवाल करता है |
लोग तो उसके थे, क्या खुदा भी उसका था…..!
- अग्यात
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November 23, 2007 by Gaurav Sangtani
शाम होते ही चरागों को बुझा देता हूँ मैं,
इक दिल ही काफी है तेरी याद में जल जाने के लिए |
-अग्यात
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November 5, 2007 by Gaurav Sangtani
बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||
वो तेरा नजरे मिलाना और पलकें झुकाना याद है मुझे |
वो तेरा सब कुछ समझना और बच के निकलना याद है मुझे ||
मेरा आङों से तकना और तेरी नजरों का मुझको पकङना,
वो भरी दुपहरी छतों पे फिरना याद है मुझे ||
बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो तेरी गलियों में मेरा भटकना याद है मुझे |
वो उन्हीं राहों से फिर फिर गुजरना याद है मुझे |
तेरी एक झलक को वो घन्टों नुक्कङ पे ठहरना,
फिर सब से बच बच के तुझको तकना याद है मुझे |
बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
मेरे कहने से पहले तेरा सब कुछ समझना याद है मुझे |
मेरे इजहार-ए-मोहब्बत से तेरा हर पल डरना याद है मुझे |
तेरे खतों का वो लम्बा इंतजार,
और चन्द अलफ़ाज़ों में तेरा बहुत कुछ लिखना याद है मुझे ||
बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
मेरी हर बात पे तेरा खिलखिला के हसना याद है मुझे |
इजहार करके तेरा खुद से ही बचना याद है मुझे |
अपनी तारीफ सुनकर तेरा वो शरमाना,
मेरे हर सवाल पे वो तेरा बाते बदलना याद है मुझे ||
बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||
- गौरव संगतानी
(अभी और बहुत कुछ याद है मुझे…)
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November 2, 2007 by Gaurav Sangtani
समझे नहीं जो खामोशी मेरी,
मेरे लब्जों को क्या समझेंगे |
बचते रहे उम्र भर साये से मेरे,
मेरे जख्मों को क्या समझेंगे |
भूल जाना यूँ तो नहीं है, रवायत मोहब्बत की |
समझे नहीं जो हालात मेरे,
इन रस्मों को क्या समझेंगे |
- गौरव संगतानी
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October 20, 2007 by Gaurav Sangtani
जो होना है वो होता है,
तेरी मेरी बिसात कुछ भी नहीं.
मैं जो यूँ अक्सर उदास रहता हूँ,
बात इतनी सी है कि……… बात कुछ भी नहीं.
- अज्ञात
(कहीं सुना था कभी)
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October 19, 2007 by Gaurav Sangtani
जिंदगी हर पल बस यही सिखाती है,
चलने का नाम ही जिंदगानी है |
जो थम गया तो मिट गया,
दरिया सिर्फ बहता पानी है ||
- गौरव संगतानी
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October 16, 2007 by Gaurav Sangtani
हे प्रभु…!
मुझे इतनी उंचाई कभी मत देना
गैरों को गले से लगा ना सकूँ
इतनी रुखाई कभी मत देना
- अटल बिहारी वाजपेयी
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October 15, 2007 by Gaurav Sangtani
एक क्षणिका….!
जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा
‘अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |
उगते हुए सूरज की किरणें,
पँछियों की चहचहाहट,
खिलते हुए फूल,
सुबह की चाय की चुस्की,
स्कूल जाते बच्चों का शोर,
धान कूटती औरतों की गप्पें,
तंदूर से आती मकई की रोटी की महक,
शाम की चाय मठरी के साथ,
सब बर्बाद…!
अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |’
जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा
- गौरव संगतानी
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October 14, 2007 by Gaurav Sangtani
कभी यूँ ही लिखा था कुछ तेरी याद मे, तेरी याद आयी तो फिर से गुनगुना दिया आज….
“दर्द की इंतहाँ हो गयी है यारों |
सुबह चले थे अब शाम हो गयी है यारों |
थक गयें हैं लेकिन कोई सहारा नहीं मिलता |
समंदर में मौजों को किनारा नहीं मिलता |
टूटा तो बहुत कुछ इस आसमां की झोली से |
इन पत्थरों में लेकिन कोई सितारा नहीं मिलता…”
बस यूँ ही….
- गौरव संगतानी
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October 14, 2007 by Gaurav Sangtani
तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
ढूँढता हूँ उस शख्स को, जिसे तूने कभी चाहा था |
अपने वादे न निभा पाया, उस गुनाहगार को ढूँढता हूँ |
तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
ढूँढता हूँ उन लम्हों को, जब करीब थे हम दोनो |
ढूँढता हूँ उन लब्जोँ को, जिन्हे उम्मीद थी मुझमें |
जिन पर साथ चले थे, उन राहों को ढूँढता हूँ |
बाँटी थी जो बातेँ, उन बातों को ढूँढता हूँ |
तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
- गौरव संगतानी
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October 10, 2007 by Gaurav Sangtani
ये कैसी है तेरे इश्क की जादूगरी,
अभी तू यहीँ है और नहीं अभी |
अभी तुझसे मिलकर हँसे थे हम,
अभी तुझे खोकर रो दिये भी |
तू ही तन्हाइयोँ में साथ मेरे,
तू ही भीङ में करे तन्हा |
तू ही तो ख्वाबोँ में है मेरे,
तू ही रातों को जगाये भी |
ये कैसी है तेरे इश्क की जादूगरी,
अभी तू यहीँ है और नहीं अभी |
- गौरव संगतानी
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October 2, 2007 by Gaurav Sangtani
हम दर्द को दबाते रहे, ये फूट फूट निकलता रहा 
कभी चेहरे से झलकता रहा, कभी आँखों से छलकता रहा.
हम हर मोड़ पर पुकारा किए और वो हमसे बचके चलता रहा.
कितनी दफ़ा गिरे हम राहों मे वो बस दूर से तकता रहा.
हमेशा ख्वाब सा ही बनकर रहा मेरे लिए वो,
मैं हरदम पकड़ता रहा, वो ओस सा पिघलता रहा.
हम दर्द को दबाते रहे, ये फूट फूट निकलता रहा
कभी चेहरे से झलकता रहा, कभी आँखों से छलकता रहा.
- गौरव संगतानी
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September 22, 2007 by Gaurav Sangtani

काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
चाहत ये ना थी सब कुछ मिले, पर कभी कुछ तो मिला होता….
हर क़दम पे तेरे साथ चले थे हम,
किसी क़दम पे हमें भी इसका सिला मिला होता….
काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
अब हम थक गये हैं इस चाहत से, इस जीने से.
मर जाते अगर कफ़न में तेरा आँचल मिला होता….
काश कभी तुमने मेरी चाहत को समझा होता.
चाहत ये ना थी सब कुछ मिले, पर कभी कुछ तो मिला होता….
- गौरव संगतानी
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September 22, 2007 by Gaurav Sangtani
जिसकी आँखों में कटी थी सदियां, 

उसने सदियों की जुदाई दी है…..
तेरी आवाज़ सुनाई दी है..
- गुलज़ार
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September 2, 2007 by Gaurav Sangtani

बहुत पहले लिखा था ये शेर, आज फिर याद आ रहा है…..
आग बुझ गयी, पर धुआँ अभी बाक़ी है.
हम कहते हैं इश्क़ नहीं, पर नशा अभी बाक़ी है.
नशे का क्या है, ये तो उम्र भर रहेगा.
शुक्र है खुदा का, जान अभी बाक़ी है.
- गौरव संगतानी
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September 1, 2007 by Gaurav Sangtani
मोहब्बत पलकों पे कितने हसीं ख्वाब सजाती है..
फूलों से महकते ख्वाब..
सितारों से जगमगाते ख्वाब..
शबनम से बरसते ख्वाब..
फिर कभी यूँ भी होता है
की पलकों की डालियों से ख्वाबों के सारे परिंदे उड़ जाते हैं
और आँखें हैरान सी रह जाती हैं.
- जावेद अख़्तर
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September 1, 2007 by Gaurav Sangtani
सुना है वक़्त के पंख हुआ करते हैं….
कुछ लम्हों में हमने इसे ठहरे हुए देखा है.
किसी की ज़ुल्फ़ो में अटके हुए देखा है
झील सी आँखों में भटकते हुए देखा है…..
बहुत तेज़ी से निकल गया जब भी रोकना चाहा इसको,
सारी यादें साथ ले गया समेटना चाहा जिनको.
पर वो कुछ लम्हें आज भी वहीं ठहरें हैं,
आधी रातों को हमने इन्हे महकते हुए देखा है……
सुना है वक़्त के पंख हुआ करते हैं….
कुछ लम्हों में हमने इसे ठहरे हुए देखा है.
किसी की ज़ुल्फ़ो में अटके हुए देखा है
झील सी आँखों में भटकते हुए देखा है…..
वो फसाना झूठ नहीं हो सकता जो ख़ुद तूने कहा था,
वो सब ख्वाब नहीं हो सकता जो देखा इन आँखों नें..
तेरी वफ़ा कैसे सवाल करूँ मैं,
पर बदलते वक़्त के साथ तुझे मैने बदलते हुए देखा है…
सुना है वक़्त के पंख हुआ करते हैं….
कुछ लम्हों में हमने इसे ठहरे हुए देखा है.
किसी की ज़ुल्फ़ो में अटके हुए देखा है
झील सी आँखों में भटकते हुए देखा है…..
- गौरव संगतानी
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August 26, 2007 by Gaurav Sangtani
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
जब कोई आहट ना हुई, ना ही कोई दस्तक दी तुमने,
कैसे चले आए इस दिल में, दिल को संभालूं कैसे..
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
राह में बहुत दूर तक, तू हर पल साथ चला था मेरे,
आज फिर से ज़रूरत है तेरी, तुझको पुकारूँ कैसे…….
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
ज़िंदगी बहुत कुछ कट गयी है, तेरी उम्मीदों के सहारे,
बहुत बाक़ी है जीवन, उम्मीदों को उभारू कैसे……
तेरे बिन मैं इस जीवन को गुज़ारूं कैसे .
हर घड़ी सोचता हूं तुझको जहन से उतारूँ कैसे..
- गौरव संगतानी
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August 18, 2007 by Gaurav Sangtani
जीवन हर पल कुछ सिखाना चाहता है,
एक नयी सीख, एक नया सबक…
पर ना जाने क्यूं ये दिल कुछ सीखना ही नही चाहता, कुछ समझना ही नहीं चाहता…..
या मानूं तो, जो दिख रहा है, उसे स्वीकरना नही चाहता…..
पर हमारे स्वीकारने या ठुकराने से सच बदल तो नही जाता…
ये पक्क्तियाँ जो कभी यूँ ही लिखी थी… आज सच होती दिखती हैं….
दिल मानता नही इसे आदत है चोट खाने की….
कितनी दफ़ा कोशिश की हमने इसे समझाने की…..
बहुत कुछ सीखा है इसने तुमसे पर इक बात सीख ना पाया……
इसे आदत नहीं यूँ ही भूल जाने की…..
- गौरव संगतानी
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